छत्तीसगढ़ के नारायणपुर ज़िले के सघन जंगलों में बुधवार की रात एक बड़ी मुठभेड़ हुई, जिसमें सुरक्षाबलों ने दो महिला माओवादियों को मार गिराया। यह मुठभेड़ कोहकामेटा थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले अबूझमाड़ इलाके में हुई, जिसे लंबे समय से माओवादी गतिविधियों का गढ़ माना जाता है।
मुठभेड़ की शुरुआत कैसे हुई?
पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार, जिला रिज़र्व गार्ड (DRG) और स्पेशल टास्क फोर्स (STF) की संयुक्त टीम को खुफिया इनपुट मिला था कि माओवादियों की ‘माड़ डिवीजन’ के वरिष्ठ कैडर इस क्षेत्र में सक्रिय हैं। इस सूचना के आधार पर बुधवार शाम सुरक्षाबलों ने सर्च ऑपरेशन शुरू किया।
जैसे ही सुरक्षाबल जंगलों में गश्त कर रहे थे, रात के समय घने जंगल में माओवादी हथियारों से लैस होकर सामने आ गए और दोनों ओर से फायरिंग शुरू हो गई। यह मुठभेड़ काफी देर तक चली और आखिरकार दो महिला माओवादी ढेर कर दी गईं।
बरामद हुए हथियार और सबूत
मुठभेड़ के बाद जब सुरक्षाबलों ने इलाके की तलाशी ली, तो दो महिला माओवादियों के शव बरामद हुए। उनके पास से एक INSAS राइफल और एक .315 बोर बंदूक भी मिली। यह संकेत है कि माओवादी न सिर्फ स्वदेशी हथियारों से, बल्कि अत्याधुनिक राइफलों से भी लैस हो रहे हैं।
अधिकारियों के अनुसार, तलाशी अभियान अभी भी जारी है क्योंकि यह आशंका जताई जा रही है कि अन्य माओवादी कैडर अब भी जंगल में छिपे हो सकते हैं। आसपास के क्षेत्रों को घेरकर बारीकी से छानबीन की जा रही है।
बढ़ती माओवादी घटनाएं और सरकार का जवाब
छत्तीसगढ़ सरकार और केंद्र सरकार दोनों मिलकर राज्य के “रेड कॉरिडोर” कहे जाने वाले क्षेत्रों — नारायणपुर, बस्तर, दंतेवाड़ा, बीजापुर, सुकमा, कांकेर और कोंडागांव — में माओवादियों के खिलाफ व्यापक अभियान चला रही हैं। यह क्षेत्र पिछले दो दशकों से माओवादी हिंसा से सबसे अधिक प्रभावित रहे हैं।
गृह मंत्रालय ने वर्ष 2026 तक देश से वामपंथी उग्रवाद (Left-Wing Extremism) को पूरी तरह समाप्त करने का लक्ष्य तय किया है। इसके तहत सुरक्षा एजेंसियों ने इस साल माओवादियों के खिलाफ आक्रामक रणनीति अपनाई है।
2024 में अब तक 219 माओवादी मारे जा चुके हैं, जबकि 2023 में यह संख्या केवल 22 थी और 2022 में 30। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि ऑपरेशन की गति और प्रभावशीलता में कई गुना बढ़ोतरी हुई है।
अबूझमाड़: माओवादियों का किला
अबूझमाड़ क्षेत्र नक्सलवादियों का एक बड़ा गढ़ माना जाता है। घने जंगल, दुर्गम पहाड़ियाँ और सीमित प्रशासनिक पहुंच के कारण यह इलाका माओवादियों के लिए सुरक्षित पनाहगाह बन गया था। यहां माओवादी अपने प्रशिक्षण शिविर, हथियार डिपो और विचारधारात्मक केंद्र भी संचालित करते रहे हैं।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षाबलों ने अबूझमाड़ में अपनी पहुंच मजबूत की है। उन्होंने माओवादियों के कई बंकर ध्वस्त किए हैं, छिपे हुए हथियारों के ज़खीरे जब्त किए हैं और स्थानीय आदिवासियों में विश्वास पैदा करने की कोशिशें की हैं।
महिला माओवादियों की भूमिका
इस मुठभेड़ में मारी गईं दोनों माओवादी महिला कैडर थीं, जोकि बताता है कि माओवादियों की रणनीति में महिलाएं भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। माओवादी संगठनों में महिलाओं को सशस्त्र प्रशिक्षण दिया जाता है और उन्हें गश्ती, सूचना संचार और ग्रामीण नेटवर्किंग जैसे कार्यों में लगाया जाता है।
अक्सर महिलाएं सुरक्षा बलों की नजरों से बच निकलने में सक्षम होती हैं, लेकिन अब सुरक्षा एजेंसियां इन पहलुओं को ध्यान में रखते हुए ऑपरेशनों को अंजाम दे रही हैं।
स्थानीय जनजातियों की भूमिका और सरकार की चुनौती
बस्तर और नारायणपुर जैसे क्षेत्रों में माओवादी गतिविधियों का आधार स्थानीय आदिवासी समुदायों की सहमति या भय पर टिका रहा है। माओवादी इन समुदायों का शोषण कर, उन्हें सरकारी नीतियों के खिलाफ भड़काते रहे हैं। लेकिन हाल के वर्षों में सरकार की ‘विकास और विश्वास’ की नीति के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल, सड़कें, स्वास्थ्य केंद्र और रोजगार योजनाएं पहुंचाई जा रही हैं।
इससे कई ग्रामीण अब माओवादियों के खिलाफ मुखर हुए हैं, और सुरक्षाबलों को समर्थन देने लगे हैं। यही वजह है कि अब माओवादी स्थानीय समर्थन खोते जा रहे हैं, और सुरक्षाबलों के लिए ऑपरेशन करना अपेक्षाकृत आसान हो रहा है।
निष्कर्ष: जीत की ओर बढ़ता संघर्ष
छत्तीसगढ़ के जंगलों में चल रही यह लड़ाई केवल बंदूक और गोली की नहीं, बल्कि विचारधारा, विकास और जनविश्वास की भी है। माओवादियों की हिंसा से आम जनता के जीवन पर पड़ा असर अब उन्हें भी सशस्त्र विद्रोह के खिलाफ खड़ा कर रहा है।
हालिया मुठभेड़ में महिला माओवादियों का मारा जाना और आधुनिक हथियारों की बरामदगी यह दिखाता है कि माओवादी अभी भी सक्रिय हैं, लेकिन सरकार और सुरक्षाबल लगातार रणनीतिक रूप से मजबूत होते जा रहे हैं।
2026 तक माओवाद को खत्म करने के लक्ष्य की ओर यह एक और कदम है, लेकिन यह लड़ाई तब तक जारी रहेगी जब तक जंगलों में डर नहीं, विकास और लोकतंत्र की गूंज नहीं सुनाई देने लगती।
















Leave a Reply