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प्रधानमंत्री मोदी और डोनाल्ड ट्रंप की कॉल पर कांग्रेस का हमला: “भारत को ट्रिपल झटका”

Congress attacks PM Modi and Donald Trump's call: "Triple blow to India"

दिल्ली की सियासत में बुधवार को एक बड़ा उबाल तब आया जब कांग्रेस पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई फोन बातचीत को लेकर तीखा हमला बोला। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने इस कॉल को “ट्रिपल झटका” करार दिया और कहा कि यह भारत की कूटनीतिक स्थिति के लिए नुकसानदेह है। इस फोन कॉल की पृष्ठभूमि में ऑपरेशन सिंदूर, पहलगाम आतंकी हमला और पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर की अमेरिका यात्रा जैसी घटनाएं जुड़ी हुई हैं, जिससे मामला और भी गंभीर हो गया है।

ट्रंप-मोदी कॉल और ऑपरेशन सिंदूर

प्रधानमंत्री मोदी और डोनाल्ड ट्रंप के बीच हाल ही में एक फोन कॉल हुई, जिसे केंद्र सरकार ने “रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने की दिशा में एक कूटनीतिक जीत” बताया। लेकिन कांग्रेस ने इस बातचीत की टाइमिंग और उसके संदर्भ को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। यह कॉल उस वक्त हुई जब ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ा हुआ था और भारत ने आतंकवाद के खिलाफ एक सख्त सैन्य कार्रवाई की थी।

जयराम रमेश ने कहा कि यह कॉल उस समय हुई जब पाकिस्तानी आर्मी चीफ असीम मुनीर अमेरिका में थे और उसी दिन वे व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति ट्रंप के साथ लंच पर जाने वाले थे। रमेश ने पूछा कि क्या प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रंप को मुनीर की उन भड़काऊ टिप्पणियों के बारे में बताया, जो उन्होंने कश्मीर को पाकिस्तान की “शरीरिक नस” बताते हुए दी थीं?

“ट्रिपल झटका” की व्याख्या

जयराम रमेश ने इस कॉल को तीन स्तरों पर “झटका” बताया:

  1. राजनयिक झटका: प्रधानमंत्री मोदी की ट्रंप से बातचीत ऐसे समय में हुई जब पाक सेना प्रमुख अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ बैठक कर रहे थे। इससे भारत की स्थिति कमजोर प्रतीत होती है।
  2. राजनीतिक झटका: रमेश ने दावा किया कि प्रधानमंत्री ने न तो विपक्ष को विश्वास में लिया, न ही संसद को सूचित किया। इससे यह सवाल खड़ा होता है कि सरकार किस एजेंडे के तहत ट्रंप से संवाद कर रही है।
  3. प्रचारात्मक झटका: ट्रंप अतीत में कई बार (कम से कम 14 बार) यह दावा कर चुके हैं कि उन्होंने भारत-पाक के बीच मध्यस्थता की पेशकश की थी। रमेश ने पूछा कि क्या इस बार भी ट्रंप ने ऐसी बात कही? अगर नहीं, तो इसका खंडन अमेरिका की तरफ से सार्वजनिक रूप से क्यों नहीं आया?

अमेरिकी रीडआउट पर विवाद

कांग्रेस ने दावा किया कि अमेरिका ने प्रधानमंत्री मोदी के साथ बातचीत का रीडआउट जारी किया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि ट्रंप ने फिर से मध्यस्थता की बात छेड़ी थी। वहीं भाजपा के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने इस दावे को “झूठ” करार देते हुए कहा कि जयराम रमेश जिस रीडआउट का हवाला दे रहे हैं, वह दरअसल जनवरी 2025 का है, न कि ताजा कॉल का। मालवीय ने रमेश को “जन्मजात झूठा” बताया और कहा कि कांग्रेस “ट्रोल सेना” की तरह व्यवहार कर रही है।

विपक्ष की संयुक्त प्रतिक्रिया

कांग्रेस अकेली नहीं थी जिसने इस मुद्दे पर सवाल उठाए। शिवसेना (यूबीटी) के नेता संजय राउत ने भी मांग की कि ट्रंप सार्वजनिक रूप से ट्वीट करके कहें कि अमेरिका का युद्धविराम में कोई रोल नहीं था। उन्होंने कहा, “अगर ट्रंप ने ऐसा कहा है, तो उन्हें अपने शब्द वापस लेने चाहिए और भारत की स्थिति का सम्मान करना चाहिए।”

जयराम रमेश ने कहा कि प्रधानमंत्री को संसद का विशेष सत्र बुलाना चाहिए और राष्ट्रपति ट्रंप के साथ हुई बातचीत की बारीकी से जानकारी देनी चाहिए। उन्होंने पूछा, “अगर प्रधानमंत्री ने 35 मिनट तक ट्रंप से बात की है, तो वही बात संसद में क्यों नहीं कही जा सकती?”

भाजपा का जवाब

भाजपा प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कांग्रेस पर “फेक न्यूज का सबसे बड़ा उत्पादक” होने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस बिना तथ्यों के सरकार की आलोचना कर रही है और भारत की छवि को अंतरराष्ट्रीय मंच पर नुकसान पहुंचा रही है।

निष्कर्ष

यह पूरा विवाद भारत की विदेश नीति, पाकिस्तान के साथ संबंध, आतंकवाद के मुद्दे और अमेरिकी नेतृत्व से भारत की डिप्लोमैटिक बातचीत के स्वरूप को लेकर उठा है। जहां एक ओर केंद्र सरकार ट्रंप से मोदी की बातचीत को “रणनीतिक सफलता” बता रही है, वहीं विपक्ष इसे “सॉफ्ट स्टैंड” और “राजनयिक असफलता” के तौर पर पेश कर रहा है।

विपक्ष की मांग है कि प्रधानमंत्री खुद सामने आकर स्पष्ट करें कि ट्रंप से क्या बातचीत हुई, पाकिस्तान को लेकर क्या रुख अपनाया गया, और भारत की संप्रभुता से जुड़ी चिंताओं को किस तरह से प्रस्तुत किया गया। ये सवाल न सिर्फ विपक्ष के हैं, बल्कि आम नागरिकों के भी हैं, जिन्हें जवाब की उम्मीद है।

भारत-पाकिस्तान के बीच एक तनावपूर्ण स्थिति के बीच अमेरिका से बातचीत अगर पारदर्शिता और स्पष्टता के बिना की गई है, तो वह ना सिर्फ राजनीति का मुद्दा बनेगा, बल्कि जनता के विश्वास को भी डिगा सकता है। ऐसे में यह ज़रूरी है कि प्रधानमंत्री और विदेश मंत्रालय इस मुद्दे पर पूरी पारदर्शिता से अपना पक्ष रखें।

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