बीजेपी हाईकमान ने पहले ही रेखा गुप्ता के नाम पर मुहर लगा दी थी, हालांकि इसकी आधिकारिक घोषणा में थोड़ा वक्त जरूर लगा। इसका कारण यह था कि पार्टी ने सही समय पर यह फैसला सार्वजनिक करने की योजना बनाई थी। सवाल यह उठता है कि आखिर रेखा गुप्ता को ही क्यों चुना गया? इसके पीछे कई अहम वजहें हैं, जिनमें उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि, चुनावी रणनीति और विभिन्न जातिगत एवं क्षेत्रीय समीकरणों को साधने की कोशिश शामिल है।
दिल्ली में आतिशी के मुख्यमंत्री बनने के बाद बीजेपी के लिए एक नई चुनौती खड़ी हो गई थी। पार्टी को एक प्रभावी महिला नेता को मुख्यमंत्री बनाना था, जिसके लिए आंतरिक स्तर पर काफी विचार-विमर्श किया गया। चुनाव से पहले किसी भी नाम की घोषणा करना मुश्किल था क्योंकि यह तय नहीं था कि कौन जीतेगा और कौन नहीं। लेकिन जीतने के बाद रेखा गुप्ता के नेतृत्व में जिस तरह से दिल्ली कैबिनेट का गठन किया गया, उससे साफ पता चलता है कि बीजेपी ने हर स्तर पर संतुलन बनाने की कोशिश की है।
रेखा गुप्ता की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह केवल एक महिला नेता ही नहीं, बल्कि एक अनुभवी संगठनकर्ता भी हैं। वह एबीवीपी की सक्रिय कार्यकर्ता रही हैं और दक्षिणी नगर निगम की मेयर भी रह चुकी हैं। एमसीडी चुनावों में उनकी रणनीतिक क्षमता प्रभावी रही है। हालांकि 2015 में उन्हें टिकट नहीं मिला था, लेकिन इस बार उनकी जीत के साथ बीजेपी ने उन्हें एक बड़ा दायित्व सौंपा है। इसके अलावा, वैश्य समुदाय, जो कभी केजरीवाल का समर्थन करता था, उसे वापस बीजेपी के साथ जोड़ने की रणनीति में भी रेखा गुप्ता महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
दिल्ली कैबिनेट के गठन में बीजेपी ने जातिगत और क्षेत्रीय समीकरणों का भी ध्यान रखा है। सिरसा, जो सिख समुदाय से आते हैं, को पंजाब चुनावों को ध्यान में रखते हुए मंत्रिमंडल में जगह दी गई है। इसी तरह, दलित समुदाय को अपने पक्ष में करने के लिए एक दलित नेता को भी कैबिनेट में शामिल किया गया है। आम आदमी पार्टी की मुस्लिम, दलित और बनिया वोटबैंक की रणनीति को काउंटर करने के लिए बीजेपी ने अपने पत्ते बहुत सोच-समझकर खेले हैं। पूरबिया समुदाय को साधने के लिए पंकज सिंह को जगह दी गई, क्योंकि यूपी और बिहार के चुनावों में यह वोटबैंक बेहद मायने रखता है।
इसके अलावा, जाट समुदाय को साधने के लिए प्रवेश वर्मा को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है। हालांकि, दक्षिणी दिल्ली का प्रतिनिधित्व इस बार की कैबिनेट में नजर नहीं आ रहा है। दक्षिण दिल्ली में गुर्जर समुदाय का खासा प्रभाव है, लेकिन इस मंत्रिमंडल में उन्हें जगह नहीं मिली।

रेखा गुप्ता के नेतृत्व में बीजेपी को कई अहम चुनौतियों का सामना करना होगा। पार्टी ने अपने चुनावी संकल्प पत्र में जो वादे किए थे, उन्हें पूरा करने की जिम्मेदारी अब उनकी सरकार की होगी। महिलाओं को 2500 रुपये देने की योजना, फ्रीबीज को संतुलित रूप से लागू करने का मुद्दा और दिल्ली के विकास से जुड़े अन्य फैसलों पर तेजी से काम करना होगा। इसके अलावा, दिल्ली में डीजल गाड़ियों पर लगी रोक हटाने की मांग भी जोर पकड़ रही है। अगर अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप डीजल और पेट्रोल गाड़ियों पर लगी रोक हटा सकते हैं, तो दिल्ली में भी इस पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए, खासकर तब जब अब आने वाला डीजल ज्यादा स्वच्छ हो चुका है और यूरोप भी भारत से इसका आयात कर रहा है।
कुल मिलाकर, बीजेपी ने रेखा गुप्ता को मुख्यमंत्री बनाकर एक संतुलित नेतृत्व की ओर कदम बढ़ाया है। उन्होंने जातिगत और क्षेत्रीय समीकरणों को साधते हुए, दिल्ली और आगामी चुनावों के लिए मजबूत रणनीति तैयार की है। अब देखना होगा कि यह नई सरकार जनता की उम्मीदों पर कितना खरा उतरती है।













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