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Transgender Amendment Act 2026: ट्रांसजेंडर संशोधन कानून 2026 को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, स्व-पहचान के अधिकार पर उठे सवाल

Transgender Amendment Act 2026

Transgender Amendment Act 2026: ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 की संवैधानिक वैधता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई है। इस याचिका के माध्यम से हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा किए गए संशोधनों को चुनौती दी गई है। याचिका में कहा गया है कि इन बदलावों से ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों का अपने लिंग की पहचान स्वयं तय करने का मौलिक अधिकार प्रभावित होता है।

यह याचिका राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर व्यक्ति परिषद की अध्यक्ष लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी और परिषद की सदस्य जैनब पटेल ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में दायर की है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि संशोधित प्रावधान ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों को कमजोर करते हैं और उनकी स्वतंत्र पहचान पर असर डालते हैं।

Transgender Amendment Act 2026

लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी किन्नर अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्वर होने के साथ-साथ एक प्रसिद्ध भरतनाट्यम नृत्यांगना, लेखिका, सामाजिक कार्यकर्ता और अस्तित्व ट्रस्ट की संस्थापक भी हैं। वहीं जैनब पटेल KPMG इंडिया में समावेशन और विविधता की निदेशक हैं और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की राष्ट्रीय परिषद (पश्चिमी क्षेत्र) की सदस्य के रूप में भी कार्यरत हैं।

याचिका में यह भी कहा गया है कि संशोधित कानून संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 के तहत ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को मिलने वाले मौलिक अधिकारों को प्रभावित करता है और इससे उनके संवैधानिक संरक्षण को गंभीर क्षति पहुंच सकती है।

ट्रांसजेंडर की परिभाषा में बदलाव पर आपत्ति

याचिका में खास तौर पर 2019 के अधिनियम की धारा 2(के) के अंतर्गत ट्रांसजेंडर व्यक्ति की परिभाषा में किए गए संशोधन को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि पहले की परिभाषा में व्यक्ति की लैंगिक पहचान को उसके व्यक्तिगत अनुभव और आत्मबोध के आधार पर मान्यता दी गई थी।

हालांकि, नए संशोधन में इस सिद्धांत को हटाकर सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान और चिकित्सकीय रूप से प्रमाणित जैविक स्थितियों की सूची को आधार बना दिया गया है। याचिका के अनुसार यह बदलाव ट्रांसजेंडर समुदाय की पहचान को सीमित कर सकता है।

स्व-पहचान के अधिकार पर असर की आशंका

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि संशोधन लागू होने के बाद ऐसे लोग, जो खुद को ट्रांसजेंडर मानते हैं लेकिन तय की गई श्रेणियों में फिट नहीं बैठते, उन्हें कानूनी मान्यता मिलने में दिक्कत हो सकती है। इससे स्व-पहचान का मूल सिद्धांत कमजोर पड़ सकता है।

इस कानून को लेकर विपक्षी दलों और कई LGBTQIA+ संगठनों ने भी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि संसद में बिल पेश करने से पहले समुदाय के प्रतिनिधियों से पर्याप्त चर्चा या सलाह नहीं ली गई।

इसी मुद्दे पर नेशनल काउंसिल ऑफ ट्रांसजेंडर पर्सन्स (NCTP) के दो सदस्यों कल्कि सुब्रमण्यम और रितुपर्णा नियोग ने राज्यसभा में बिल पास होने वाले दिन ही अपने पदों से इस्तीफा दे दिया था।

अब इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला तय करेगा कि ट्रांसजेंडर संशोधन कानून 2026 संवैधानिक कसौटी पर कितना खरा उतरता है।

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