एक नई वैज्ञानिक रिपोर्ट से इंसानियत के लिए गंभीर चेतावनी सामने आई है। अगर दुनिया का तापमान आने वाले समय में औद्योगिक युग से 2°C ज़्यादा बढ़ा, तो हिंदू कुश हिमालय (HKH) क्षेत्र अपनी 75% बर्फ 2099 तक खो सकता है। यानि हमारे हिमालयी ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और अगर हम अब भी नहीं चेते, तो अगले 75 साल में पहाड़ों की ये ठंडी विरासत इतिहास बन सकती है। इस क्षेत्र की नदियाँ, पेयजल स्रोत और जैवविविधता सीधे इस बर्फ पर निर्भर हैं। इसके पिघलने का असर सिर्फ पर्यावरण नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की ज़िंदगी, खेती और पानी की सप्लाई पर पड़ेगा।
पिघलते हिमालयी ग्लेशियर: क्या प्यासे मर जाएंगे लोग?

हिमालय और उसके आसपास के ग्लेशियर सिर्फ बर्फ के पहाड़ नहीं हैं, बल्कि करोड़ों लोगों की जीवनरेखा हैं। ये ग्लेशियर एशिया की प्रमुख नदियों — जैसे गंगा, ब्रह्मपुत्र, यांग्त्से और सिंधु — का मुख्य स्रोत हैं। एक नई स्टडी बताती है कि अगर दुनिया ने ग्लोबल वार्मिंग को कंट्रोल नहीं किया, तो आने वाले दशकों में करीब 200 करोड़ लोगों को पीने का पानी, सिंचाई और जीवन जीने के लिए जरूरी संसाधनों की भारी कमी का सामना करना पड़ सकता है।
जर्नल “साइंस” में छपी इस रिसर्च में कहा गया है कि:
अगर तापमान 2°C तक बढ़ा, तो हिमालय का 75% बर्फ खत्म हो सकता है।
लेकिन अगर हम वार्मिंग को 1.5°C तक सीमित रखते हैं, तो 40-45% बर्फ बचाई जा सकती है।
ये आंकड़े सिर्फ पर्यावरण की चिंता नहीं हैं, ये मानव अस्तित्व की चेतावनी हैं। अगर अभी नहीं चेते, तो कल बहुत देर हो सकती है।
क्या 75 साल बाद पानी के लिए तरसेंगे लोग?

एक नई वैज्ञानिक स्टडी के अनुसार, अगर धरती का तापमान इसी रफ्तार से बढ़ता रहा तो आने वाले 75 सालों यानी साल 2099 तक हिमालय क्षेत्र की लगभग 75 फीसदी बर्फ पिघल सकती है। यह कोई साधारण चेतावनी नहीं है, बल्कि मानव जीवन के लिए एक बड़ा खतरा है। हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र न सिर्फ भारत बल्कि एशिया के कई देशों के लिए जीवनदायिनी नदियों का स्रोत है। इन ग्लेशियरों से निकलने वाली नदियाँ करीब 200 करोड़ लोगों की पानी की ज़रूरत पूरी करती हैं। अब ज़रा सोचिए, अगर यही ग्लेशियर ही न रहे तो पानी कहाँ से मिलेगा?
ग्लोबल वॉर्मिंग अगर 2.7 डिग्री सेल्सियस तक पहुँचती है, तो दुनिया के ग्लेशियरों का केवल 24 प्रतिशत हिस्सा ही बचेगा। यानी बाकी सारी बर्फ पिघल जाएगी। इसका मतलब है – न पीने को साफ पानी मिलेगा, न खेतों को सिंचाई के लिए। सूखा पड़ेगा, फसलें नहीं होंगी और करोड़ों लोगों के जीवन पर खतरा मंडराएगा। ये कोई फिल्मी कल्पना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक रिसर्च पर आधारित अनुमान है।
हालांकि इस संकट से बचा भी जा सकता है। अगर हम अभी से चेत जाएं और तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने में कामयाब हो जाएं, तो हम ग्लेशियर की करीब 54 फीसदी बर्फ को बचा सकते हैं। इसका मतलब है कि हम जल संकट से बच सकते हैं और भविष्य को सुरक्षित बना सकते हैं। इसके लिए हमें कार्बन उत्सर्जन कम करना होगा, पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली अपनानी होगी और साफ ऊर्जा की तरफ तेजी से बढ़ना होगा।
यूरोप के आल्प्स, अमेरिका के रॉकीज़, आइसलैंड और स्कैंडिनेविया जैसे क्षेत्र भी इस संकट से अछूते नहीं रहेंगे। वहां तो ग्लेशियर पूरी तरह से खत्म होने की कगार पर पहुंच सकते हैं। इसलिए यह सिर्फ भारत या हिमालय की बात नहीं है, यह पूरी दुनिया के लिए खतरे की घंटी है। अब फैसला हम सबके हाथ में है – या तो अभी से कदम उठाकर इस खतरे को टालें, या फिर आने वाली पीढ़ियों को पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसता छोड़ दें।
ग्लेशियर पिघलते रहेंगे, चाहे तापमान स्थिर क्यों न हो जाए!

वैज्ञानिकों ने चेताया है कि ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण ग्लेशियरों को जो नुकसान हो रहा है, वह सिर्फ आज की चिंता नहीं, बल्कि आने वाले कई दशकों और सदियों तक असर छोड़ने वाला है। भले ही हम आज वैश्विक तापमान को स्थिर कर लें, लेकिन ग्लेशियर का पिघलना इतनी जल्दी नहीं रुकेगा। उन्हें फिर से पहले जैसी ऊंचाई और स्थिर स्थिति में आने में सैकड़ों साल लग सकते हैं।
इस स्टडी में 10 देशों के करीब 21 वैज्ञानिकों की टीम ने हिस्सा लिया और 2 लाख से ज्यादा ग्लेशियरों पर रिसर्च की। उन्होंने ग्लोबल वॉर्मिंग के अलग-अलग संभावित हालातों के आधार पर 8 अलग-अलग ग्लेशियर मॉडल्स का इस्तेमाल किया। यह रिपोर्ट उस समय जारी की गई जब ताजिकिस्तान की राजधानी दुशांबे में ग्लेशियरों पर संयुक्त राष्ट्र का पहला बड़ा सम्मेलन चल रहा है, जिसमें 50 से ज्यादा देश हिस्सा ले रहे हैं।
इसका मतलब साफ है – ग्लेशियरों को बचाने के लिए अभी नहीं जागे तो आने वाले वर्षों में इसका असर हम सबकी ज़िंदगी और पीढ़ियों पर पड़ेगा। सिर्फ सरकारें नहीं, हमें भी अपनी ज़िम्मेदारी समझनी होगी।
















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