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2027 Assembly Elections: बीजेपी का मास्टर प्लान 70 सेनापति तैयार, सोशल इंजीनियरिंग पर फोकस

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जिलाध्यक्षों के जरिए जातीय समीकरण साधने की कोशिश

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को देखते हुए बीजेपी ने अपनी चुनावी रणनीति को धार देना शुरू कर दिया है। दो महीने की माथापच्ची के बाद पार्टी ने 98 में से 70 जिलों के जिला और महानगर अध्यक्षों के नामों की घोषणा कर दी है। बाकी 28 जिलों के लिए कुछ दिनों बाद घोषणा की जाएगी। इस सूची में पार्टी ने अपने कोर वोट बैंक को साधते हुए सोशल इंजीनियरिंग का पूरा ध्यान रखा है।

सोशल इंजीनियरिंग में ब्राह्मणों को प्राथमिकता, दलितों की भागीदारी कम

बीजेपी ने नए जिलाध्यक्षों की नियुक्ति में जातीय संतुलन साधने की पूरी कोशिश की है। पार्टी ने कुल 70 में से 39 जिलाध्यक्ष सवर्ण समुदाय से, 25 ओबीसी से और 6 दलित समाज से बनाए हैं। हालांकि, महिलाओं और दलितों की भागीदारी अपेक्षाकृत कम रही।

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ब्राह्मण-ठाकुर-बनिया-कायस्थ समीकरण पर दांव

बीजेपी ने अपने कोर वोट बैंक को मजबूती देने के लिए सवर्णों को प्राथमिकता दी है। इस सूची में 20 ब्राह्मण, 10 ठाकुर, 4 बनिया, 3 कायस्थ और 2 भूमिहार जिलाध्यक्ष बनाए गए हैं। प्रमुख ब्राह्मण नेताओं में गोरखपुर से जनार्दन द्विवेदी, बस्ती से विवेकानंद मिश्र, बलिया से संजय मिश्रा और लखनऊ महानगर से आनंद द्विवेदी का नाम शामिल है।

ओबीसी को साधने की रणनीति

बीजेपी ने ओबीसी समाज से 25 जिलाध्यक्ष बनाए हैं। इनमें सबसे अधिक 5 कुर्मी, 4 मौर्य-कुशवाहा-सैनी, 4 अन्य ओबीसी जातियों से, 2 लोध, और यादव, बढ़ई, कश्यप, पाल, राजभर जातियों से एक-एक जिलाध्यक्ष बनाए गए हैं। प्रमुख नामों में कानपुर देहात से रेणुका सचान, लखनऊ से विजय मौर्य और महोबा से मोहनलाल कुशवाह शामिल हैं।

दलित और महिला नेतृत्व को नहीं मिली खास तवज्जो

बीजेपी ने सिर्फ 6 दलित नेताओं को जिलाध्यक्ष बनाया है, जबकि प्रदेश में दलितों की आबादी 22% से अधिक है। पासी, धोबी, कोरी और कठेरिया समाज से कुल 6 जिलाध्यक्ष बनाए गए हैं। इसी तरह, महिलाओं को भी अपेक्षित भागीदारी नहीं मिल सकी और सिर्फ 5 महिला जिलाध्यक्ष बनाए गए हैं।

2027 के चुनावी समीकरण को मजबूत करने की कोशिश

बीजेपी ने पंचायत चुनाव 2026 और विधानसभा चुनाव 2027 को ध्यान में रखते हुए जातीय संतुलन बनाने की कोशिश की है। सवर्ण और ओबीसी समुदायों को खास तरजीह देकर पार्टी ने सपा के पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) गठजोड़ को काउंटर करने की रणनीति बनाई है। हालांकि, दलितों और महिलाओं की भागीदारी को लेकर अभी भी सवाल बने हुए हैं।

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