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‘सबूत, सहानुभूति और इक्विटी’: सुकार्या की अंतर्राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में एशिया के पॉलिसीमेकर और युवा एडवोकेट्स ने मिलकर ‘हेल्थ इक्विटी’ को किया रीडिफ़ाइन

नई दिल्ली, 14 अक्टूबर, 2025: एशिया की बढ़ती युवा आबादी के स्वास्थ्य और पोषण चुनौतियों पर केंद्रित, सुकार्या ने आज नई दिल्ली में पब्लिक हेल्थ और न्यूट्रिशन पर तीसरा इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस (ICPHN 2025) का सफल आयोजन किया। इस महत्वपूर्ण मंच पर एशिया भर के पॉलिसीमेकर, रिसर्चर, प्रैक्टिशनर और यूथ एडवोकेट एक साथ आए ताकि आज की जटिल दुनिया में ‘हेल्थ इक्विटी’ के मायने को फिर से परिभाषित किया जा सके।

भारत में रह रहे 250 मिलियन से ज़्यादा किशोरों के संदर्भ में, कॉन्फ्रेंस की थीम—’सबूत, सहानुभूति और इक्विटी मिलकर कैसे एक हेल्दी, ज़्यादा इंसाफ़ वाला भविष्य बना सकते हैं’—ने एक ज़रूरी बात को छुआ। सुकार्या का मिशन, पॉलिसी और लोगों के बीच की दूरी को कम करते हुए, स्वास्थ्य को एक साझा सामाजिक जिम्मेदारी में बदलना है।

कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए, डॉ. ज़ोया अली रिज़वी, डिप्टी कमिश्नर, न्यूट्रिशन और एडोलसेंट हेल्थ, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार ने राष्ट्रीय मिशन के प्रिवेंटिव हेल्थ और बिहेवियरल चेंज पर सरकार के फोकस को रेखांकित किया।

डॉ. रिज़वी ने कहा, “हम एक बड़ा बदलाव देख रहे हैं। हमारी कोशिश सिर्फ़ बीमारी का इलाज करना नहीं है, बल्कि युवाओं में हेल्थ लिटरेसी और सेल्फ़-केयर का कल्चर बनाकर गैर-संक्रामक बीमारियों को जल्दी शुरू होने से रोकना है। इसका उद्देश्य हर किशोर तक ऐसे प्रोग्राम पहुँचाना है जो सिर्फ़ समाधान ही न बताएँ, बल्कि स्वास्थ्य की ओनरशिप भी दिलाएँ।”

डॉ. रिज़वी की यह टिप्पणी एक महत्वपूर्ण समय पर आई है। नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार, भारत में 15-19 साल की लगभग 59% किशोर लड़कियाँ एनीमिया से पीड़ित हैं, जो पिछले सर्वे में 54% थी। यह बढ़ता ट्रेंड दिखाता है कि प्रतिक्रियाशील इलाज के बजाय निवारक और सामुदायिक हस्तक्षेपों को मज़बूत करने की तुरंत ज़रूरत है।
सुकार्या की फ़ाउंडर और चेयरपर्सन, सुश्री मीरा सत्पथी ने कम्युनिटी ओनरशिप के महत्व पर ज़ोर देते हुए कहा, “स्वास्थ्य के परिणाम सिर्फ़ सिस्टम से बेहतर नहीं होते; वे तब बेहतर होते हैं जब कम्युनिटी ओनरशिप लेती है। असली बदलाव ज़मीनी स्तर से शुरू होता है।”

UN Women India की कंट्री रिप्रेजेंटेटिव (OIC) कांता सिंह ने अपने ग्रामीण हरियाणा से वैश्विक नेतृत्व तक के सफ़र का हवाला देते हुए कहा कि कैसे एक्सपोजर, एजुकेशन और स्पोर्ट्स युवाओं की ज़िंदगी बदल सकते हैं। उन्होंने कहा, “स्पोर्ट्स ने मुझे आत्मविश्वास, अनुशासन और अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलने की हिम्मत सिखाई। लड़कियों के लिए, गतिशीलता (Mobility) ही सशक्तिकरण है और सशक्तिकरण ही स्वास्थ्य है।”

पब्लिक हेल्थ रिसोर्स सोसाइटी (PHRS) की प्रिंसिपल टेक्निकल एडवाइजर डॉ. वंदना प्रसाद ने ज़मीनी स्तर से शुरू हुए बदलावों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, “हम अक्सर उन्हें लाभार्थी कहते हैं, लेकिन वे अधिकार रखने वाले और ज्ञान रखने वाले हैं। जब झारखंड में आदिवासी किशोरों ने अपने पैड बैंक, किचन गार्डन, और रीडिंग क्लब बनाए, तो वे अपनी भाषा में सस्टेनेबिलिटी को नए तरीके से समझा रहे थे।”

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