
पौड़ी, उत्तराखंड के साहित्यिक परिदृश्य को गर्व है कि उनके सुप्रसिद्ध हिंदी और गढ़वाली साहित्यकार नरेंद्र कठैत को विश्व के शीर्ष 100 हिंदी साहित्यकारों में स्थान मिला है। हाल ही में जारी राही रैंकिंग-2025 की सूची में उन्हें 48वां स्थान प्राप्त हुआ है। इस उपलब्धि पर पौड़ी जिले और पूरे प्रदेश के साहित्य, संस्कृति, संगीत और रंगकर्म के जगत में खुशी की लहर है।
सल्डा गांव, कोट विकासखंड निवासी नरेंद्र कठैत वर्तमान में आकाशवाणी पौड़ी में कार्यरत हैं। दिल्ली के किदवई नगर में 28 अप्रैल 1966 को जन्मे कठैत का बचपन से ही साहित्य में गहरा लगाव रहा। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा नेहरू माउंटिंग स्कूल, लोधी रोड, दिल्ली और माध्यमिक शिक्षा इंटर कॉलेज, पौड़ी से प्राप्त की।
गढ़वाल विश्वविद्यालय, बीजीआर परिसर, पौड़ी से स्नातक करने के बाद भी कठैत की साहित्यिक यात्रा निरंतर जारी रही। हिंदी और गढ़वाली साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को व्यापक मान्यता मिली। विशेष रूप से गढ़वाली व्यंग्य लेखन में उन्हें विशेष ख्याति मिली।
अब तक कठैत के नाम आठ व्यंग्य संग्रह, दो खंडकाव्य, दो कविता संग्रह, दो नाटक, चार अनुवादित ग्रंथ, तीन आलेख संग्रह, एक संपादित पुस्तक और एक जीवनी प्रकाशित हो चुकी है। उन्होंने 500 से अधिक कविताओं का गढ़वाली में अनुवाद किया है और पत्र-पत्रिकाओं में कविता, व्यंग्य, अनुवाद और समसामयिक आलेख लिखते रहे हैं।
इसी के साथ उन्हें इंडिया नेटबुक्स की सूची में 21वीं सदी के 251 श्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय व्यंग्यकारों में भी शामिल किया गया। दिवंगत साहित्यकार डॉ. नागेंद्र ध्यानी ‘अरुण’ ने अपनी पुस्तक “गढ़वाली लोक साहित्य का कालजयी व्यंग्यकार नरेंद्र कठैत: समालोचना के निकर्ष” में उनके साहित्यिक योगदान को विश्लेषित किया है।
कठैत का साहित्य अब उच्च शिक्षा में भी पढ़ाया जाता है। उनके काव्य संग्रह ‘तबारि अर अबारि’ को श्री गुरु रामराय विश्वविद्यालय, देहरादून के बीए द्वितीय सेमेस्टर में और व्यंग्य संग्रह ‘बक्कि तुमारि मर्जी’ को एमए द्वितीय सेमेस्टर में पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। इसके अलावा उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के गढ़वाली भाषा प्रमाणपत्र कार्यक्रम में भी उनकी पुस्तकें पढ़ाई जाती हैं।














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