फरीदाबाद, 16 अक्टूबर 2025: भारत में नवजात चिकित्सा के क्षेत्र में एक अभूतपूर्व उपलब्धि दर्ज की गई है। अमृता अस्पताल, फरीदाबाद के डॉक्टरों ने मात्र 23 सप्ताह के गर्भकाल में जन्मे शिशुओं को पूर्ण रूप से स्वस्थ अवस्था में जीवित रखकर इतिहास रचा है। यह अब तक का भारत में सबसे कम आयु वाले शिशुओं का सफल जीवन-रक्षण है। जन्म के समय इन शिशुओं का वजन केवल 500–600 ग्राम था।
पहला मामला 23 सप्ताह और 5 दिन के शिशु का था, जिसका जन्म वजन मात्र 550 ग्राम था। जन्म के तुरंत बाद लगभग 30 मिनट तक शिशु को ऑक्सीजन और ग्लूकोज़ नहीं मिला और उसे गैर-जीवित घोषित कर दिया गया। इसके बाद परिजन शिशु को अमृता अस्पताल लेकर आए। अस्पताल की एनआईसीयू टीम ने विश्वस्तरीय तकनीक और संवेदनशील देखभाल के माध्यम से शिशु को 90 दिन तक विशेष देखभाल दी। इस दौरान शिशु का वजन बढ़कर 2200 ग्राम हो गया और उसे पूरी तरह स्वस्थ, सामान्य मस्तिष्क और फेफड़ों की कार्यक्षमता के साथ घर भेजा गया। यह चिकित्सकीय इतिहास में एक दुर्लभ उपलब्धि मानी जा रही है।
कुछ महीनों बाद एक और अद्वितीय रिकॉर्ड बना —23 सप्ताह और 6 दिन में जन्मे जुड़वां शिशु, जो 41 वर्षीय माँ से जन्मे थे। ये दोनों शिशु बिना किसी न्यूरोलॉजिकल या फेफड़ों की जटिलताओं के पूरी तरह स्वस्थ हैं। जुड़वां-1 का वजन 500 ग्राम था और उसे केवल डेढ़ दिन तक वेंटिलेशन की जरूरत पड़ी, जबकि जुड़वां-2 का वजन 630 ग्राम था और उसे किसी वेंटिलेशन की आवश्यकता नहीं हुई। दोनों शिशु आज पूरी तरह स्वस्थ हैं और किसी प्रकार की रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी (ROP) के बिना सामान्य विकास कर रहे हैं।
अमृता अस्पताल के वरिष्ठ नवजात शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. हेमंत शर्मा ने कहा,
> “दशकों तक 23 सप्ताह की गर्भावस्था को ‘ग्रे जोन ऑफ सर्वाइवल’ माना जाता था, यहां तक कि विकसित देशों में भी। आज हमने यह साबित किया है कि जब विज्ञान, करुणा और परिवार का विश्वास साथ हो, तो चमत्कार संभव हैं। ये बच्चे सिर्फ जीवित नहीं रहे, बल्कि पूरी तरह स्वस्थ और सामान्य जीवन जी रहे हैं। यह भारतीय नवजात चिकित्सा के लिए एक ऐतिहासिक क्षण है।”
शिशुओं की माँ ने कहा,
> “जब डॉक्टरों ने कहा कि कोई उम्मीद नहीं है, हमारा दिल टूट गया। लेकिन अमृता की टीम ने हमें विश्वास दिलाया। आज दोनों बच्चे स्वस्थ हैं और हमारी गोद में मुस्कुरा रहे हैं, यह ईश्वर के स्पर्श जैसा अनुभव है।”
अमृता अस्पताल की एनआईसीयू टीम ने उच्च आर्द्रता वाले विशेष इनक्यूबेटर, प्रकाश और ध्वनि पर नियंत्रण, और ‘कंगारू केयर’ जैसी तकनीकों का उपयोग किया। इस तकनीक के तहत बच्चे को माँ के सीने से लगाया गया, जिससे उनका **समान्य विकास और स्थिरता सुनिश्चित हुई।
विशेष ध्यान देने योग्य बात यह रही कि पहले शिशु को केवल 48 घंटे वेंटिलेशन पर रखा गया, जबकि सामान्य तौर पर 23 सप्ताह के शिशुओं को 2–3 सप्ताह तक वेंटिलेशन की आवश्यकता होती है। केवल छह दिनों में शिशुओं को माँ का दूध दिया जाने लगा, जो सामान्य समय से आधा समय है।
इन सफलताओं के साथ, अमृता अस्पताल भारत में उन चुनिंदा केंद्रों में शामिल हो गया है जो 23 सप्ताह से भी पहले जन्मे शिशुओं की पूर्ण स्वस्थ जीवन-रक्षा सुनिश्चित कर रहे हैं। यह उपलब्धि भारतीय नवजात चिकित्सा के क्षेत्र में एक नई दिशा और उम्मीद की किरण साबित हो रही है।















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