बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान के बाद सियासी सरगर्मी तेज़ हो गई है। एनडीए और महागठबंधन दोनों ही गठबंधन सीट बंटवारे के फॉर्मूले पर गहन मंथन में जुटे हैं। इसी बीच विपक्षी महागठबंधन के भीतर अब उपमुख्यमंत्री पद को लेकर नई खींचतान सामने आई है। सूत्रों के मुताबिक, महागठबंधन तीन डिप्टी सीएम के फॉर्मूले पर गंभीरता से विचार कर रहा है।
इस प्रस्ताव के अनुसार, एक उपमुख्यमंत्री दलित समुदाय से, दूसरा मुस्लिम समुदाय से और तीसरा अतिपिछड़ा वर्ग (EBC) से होगा। ये तीनों डिप्टी सीएम क्रमशः आरजेडी, कांग्रेस और वीआईपी पार्टी से बनाए जा सकते हैं।
हाल ही में हुई महागठबंधन की बैठक में यह प्रस्ताव रखा गया कि अगर विपक्षी गठबंधन सत्ता में आता है, तो तीनों प्रमुख सहयोगी दलों — आरजेडी, कांग्रेस और वीआईपी — को एक-एक उपमुख्यमंत्री पद दिया जाए। हालांकि, दिल्ली में मौजूद कांग्रेस नेतृत्व से इस मुद्दे पर अंतिम चर्चा बाकी है, लेकिन माना जा रहा है कि इस फॉर्मूले पर जल्द सहमति बन सकती है।
वीआईपी पार्टी प्रमुख मुकेश सहनी पहले से ही डिप्टी सीएम पद की मांग कर रहे हैं, वहीं कांग्रेस भी सत्ता में अपनी ठोस हिस्सेदारी चाहती है। ऐसे में तेजस्वी यादव के इस नए राजनीतिक समीकरण को “मास्टर स्ट्रोक” माना जा रहा है, जो सामाजिक संतुलन के साथ गठबंधन की एकता को मजबूत करने की कोशिश है।
आरजेडी प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने बताया कि सीट बंटवारे के फॉर्मूले को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया जारी है। संभावित योजना के तहत आरजेडी 125 सीटों, कांग्रेस 50-55 सीटों, और वाम दल करीब 25 सीटों पर चुनाव लड़ सकते हैं। जबकि बाकी सीटें वीआईपी पार्टी, पशुपति पारस गुट की एलजेपी और झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) जैसे सहयोगियों को दी जाएंगी।
कांग्रेस नेता प्रवीण सिंह कुशवाहा ने कहा कि यह कदम राहुल गांधी के “समावेशी राजनीति के दृष्टिकोण” को दर्शाता है, जो सामाजिक न्याय की गाथा को और अधिक व्यापक बनाता है। वहीं वीआईपी प्रवक्ता देव ज्योति ने दावा किया कि तेजस्वी यादव की दूरदर्शिता से प्रेरित यह फॉर्मूला गठबंधन को नई दिशा देगा, और मुकेश सहनी उपमुख्यमंत्रियों में से एक होंगे।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तीन डिप्टी सीएम का यह संतुलन जातीय समीकरणों और वोट बैंक की राजनीति को साधने की रणनीति है। यह न सिर्फ RJD की “यादव-केंद्रित राजनीति” की छवि को तोड़ने की कोशिश है, बल्कि दलितों, मुसलमानों और अतिपिछड़ों को एक साझा राजनीतिक मंच पर लाने का प्रयास भी है।
















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