पटना: बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान 6 नवंबर को होने जा रहा है। चुनाव की तारीखों के ऐलान से पहले ही कई न्यूज चैनलों, वेबसाइटों और एजेंसियों ने ओपिनियन पोल (जनमत सर्वेक्षण) जारी कर दिए थे।
पहले चरण के प्रचार थमने तक यह सिलसिला जारी रहा। अब जैसे-जैसे चुनाव के दोनों चरण पूरे होंगे, वैसे ही एग्जिट पोल (मतदान पश्चात पूर्वानुमान) सामने आने लगेंगे।
ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि — ओपिनियन पोल और एग्जिट पोल में आखिर फर्क क्या है?
ओपिनियन पोल क्या होता है?
ओपिनियन पोल, यानी जनता की राय जानने का सर्वेक्षण, चुनाव से पहले किया जाता है।
इसमें आम मतदाताओं से पूछा जाता है कि वे किस पार्टी या उम्मीदवार का समर्थन कर रहे हैं, या चुनाव में किसे वोट देना चाहेंगे।
ये सर्वे चुनाव की घोषणा से पहले और आदर्श आचार संहिता लागू होने के बाद भी जारी रह सकते हैं।
यह एक “प्री-पोल सर्वे” होता है, जिसका मकसद जनता का मूड और रुझान समझना होता है।
समय के साथ राजनीतिक माहौल बदलने से इन सर्वेक्षणों के नतीजों में भी बदलाव देखने को मिलता है।
एग्जिट पोल क्या होता है?
एग्जिट पोल मतदान के दिन या चरण के पूरा होने के तुरंत बाद किया जाता है।
इसमें मतदान केंद्र से बाहर निकलने वाले मतदाताओं से पूछा जाता है कि उन्होंने किस पार्टी या उम्मीदवार को वोट दिया है।
इन जवाबों के आधार पर आंकड़ों का विश्लेषण कर यह अनुमान लगाया जाता है कि कौन सी पार्टी कितनी सीटें जीत सकती है।
यह एक “पोस्ट-वोट सर्वे” होता है, यानी वास्तविक मतदान के बाद की प्रतिक्रिया।
हालांकि, चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार, सभी चरणों का मतदान पूरा होने से पहले एग्जिट पोल के नतीजे प्रसारित नहीं किए जा सकते।
इसलिए बिहार चुनाव के मामले में एग्जिट पोल 11 नवंबर को शाम 6:30 बजे के बाद ही जारी किए जाएंगे।
दोनों में क्या है अंतर
बिंदु ओपिनियन पोल एग्जिट पोल
समय मतदान से पहले किया जाता है मतदान के बाद किया जाता है
उद्देश्य जनता का मूड और रुझान जानना मतदाताओं के वास्तविक वोट की दिशा जानना
सर्वे प्रतिभागी सभी लोग (वोटर हों या न हों) केवल वे लोग जिन्होंने वोट डाला है
विश्वसनीयता अनुमान आधारित, समय के साथ बदल सकता है मतदान पर आधारित, लेकिन 100% सटीक नहीं
घोषणा का समय चुनाव प्रचार अवधि के दौरान सभी चरणों की वोटिंग खत्म होने के बाद
कितने भरोसेमंद होते हैं ये सर्वे?
कई बार एग्जिट पोल के अनुमान मतगणना के नतीजों से काफी हद तक मेल खाते हैं,
जबकि कुछ मौकों पर बिलकुल गलत साबित हो जाते हैं। इसी तरह, ओपिनियन पोल में भी समय के साथ जनता की राय बदल जाने के कारण पूर्वानुमान सटीक नहीं रहते। इसलिए, विशेषज्ञ इन्हें चुनावी माहौल का संकेतक तो मानते हैं, लेकिन अंतिम सत्य नहीं।
















Leave a Reply